फोर्टिस अस्पताल प्रबंधन और वहां की सीनियर गाइनीकोलॉजिस्ट डॉ. मोनिका बधावन के खिलाफ महिला के पेट में गॉज (कॉटन की पट्टी) छोड़ने के मामले में दो साल बाद रिपोर्ट दर्ज की गई है।
यह रिपोर्ट डीएम गौतमबुद्ध नगर द्वारा गठित बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर सेक्टर-58 थाने में दर्ज की गई। इन दो सालों में पीड़िता ने न्याय के लिए कई अधिकारियों के चक्कर काटे।
पूरी तरह से स्वस्थ होने में उनके सात लाख से ज्यादा रुपये लग गए। वहीं, पीड़िता का मानना है कि अभी उन्हें पूरी तरह न्याय नहीं मिला है। पूरा न्याय तब होगा, जब दोषी अस्पताल प्रबंधन के लोग और डॉक्टर जेल जाएंगे।
मूल रूप से अलीगढ़ निवासी अमूल भार्गव दिल्ली स्थित एक मल्टी नेशनल कंपनी में काम करते हैं। फिलहाल वह फरीदाबाद स्थित चार्मवुड विलेज में रह रहे हैं। 23 दिसंबर 2013 को उन्होंने पत्नी नम्रता (30) को नोएडा के फोर्टिस अस्पताल में सीजेरियन डिलीवरी के लिए भर्ती कराया।
डिलीवरी फोर्टिस अस्पताल की सीनियर सीजेरियन डॉ. मोनिका बधावन और उनकी टीम के नेतृत्व में हुई। डॉक्टर की लापरवाही से ऑपरेशन के दौरान नम्रता के पेट में गॉज (कॉटन की पट्टी) छूट गया।
मोनिका को फिट बताते हुए कुछ दिन बाद� अस्पताल से छुट्टी भी दे दी गई। छह माह बाद पट्टी की वजह से नम्रता के पेट में दर्द रहने लगा। जब नम्रता ने दर्द के बारे में डॉ. मोनिका और अस्पताल प्रबंधन को बताया तो उन्होंने इसे नकार दिया।
मोनिका को फिट बताते हुए कुछ दिन बाद� अस्पताल से छुट्टी भी दे दी गई। छह माह बाद पट्टी की वजह से नम्रता के पेट में दर्द रहने लगा। जब नम्रता ने दर्द के बारे में डॉ. मोनिका और अस्पताल प्रबंधन को बताया तो उन्होंने इसे नकार दिया।
