भारत की पहली पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा एक फरवरी को आम बजट पेश किया जाएगा। कोविड महामारी के इस दौर में सभी क्षेत्र अपने मांगों को लिए खड़े हैं। 2019 में वित्त मंत्री का पद संभालने के बाद से यह सीतारमण का चौथा बजट होने वाला है। केंद्र 31 जनवरी को संसद में आर्थिक सर्वे पेश करेगा। इसमें पिछले एक साल के आर्थिक विकास की समीक्षा होती है। यह सभी क्षेत्रों-औद्योगिक, कृषि, विनिर्माण सहित अन्य के डेटा की जानकारी देता है। गौरतलब है कि न सिर्फ भारत के ही किसी नेता बल्कि पाकिस्तान के पीएम भी अतीत में ऐसी सब जिम्मेदारी भारत के लिए निभा चुके हैं। साफ शब्दों में कहें तो पाकिस्तान में रह चुके एक प्रधानमंत्री ने किसी समय में भारत का बजट पेश किया था। वह तब भारत के वित्त मंत्री हुआ करते थे।
हम बात कर रहे हैं लियाकत अली खान की।
लियाकत अली खान
लियाकत अली खान
का जन्म 1 अक्टूबर 1895 को अविभाजित पंजाब के करनाल में हुआ था। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भी पढ़ाई की। मुस्लिम लीग के अग्रिम पंक्ति के नेता लियाकत अली खान भी पाकिस्तान आंदोलन के दौरान मुहम्मद अली जिन्ना के साथ बहुत सक्रिय थे। इसका लाभ उन्हें भारत के विभाजन पर मिला और वे पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने। वह भारत की वित्त मंत्री भी रहे थे।
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पढ़ें- आखिर क्या है पूरी कहानी
कहानी यह है कि भारत-पाकिस्तान की पूर्ण स्वतंत्रता से पहले, अंग्रेजों के अधीन एक अस्थायी सरकार का गठन किया गया था। इस सरकार में भी जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे, जो भारत की आजादी के बाद पहले प्रधानमंत्री बने। लियाकत अली खान इस सरकार में वित्त मंत्री थे। इतना ही नहीं, उन्होंने उस समय भारत का बजट भी पेश किया था, लेकिन तब भारत और पाकिस्तान एक ही थे।
बड़ा फैक्ट
बता दें कि यह आजादी के करीब एक साल पहले बनी अंतरिम सरकार थी, जिसमें वित्त विभाग का प्रभार मुस्लिम लीग के लियाकत अली के पास था। इसके बाद 1947 में भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ और दोनों देश आजाद हो गए। इसके बाद लियाकल अली को पाकिस्तान का पहला प्रधानमंत्री बनाया गया।
लियाकत अली खान ने 15 अगस्त 1947 को पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी, लेकिन 16 अक्टूबर 1951 को रावलपिंडी में उनकी हत्या कर दी गई थी। लियाकत अली खान चार साल, दो महीने और दो दिन तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे। वर्ष 1950 में उन्होंने 8 अप्रैल 1950 को भारत और पाकिस्तान के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसका विशेष उद्देश्य दोनों देशों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुरक्षित करना और भविष्य में युद्ध की संभावना को खत्म करना था। हालांकि इससे कई नेता नाराज हो गए थे।
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