क्‍वाड की चुनौतियां

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Feb 21st 2022, 20:36, by Bishwa Jha

सतीश कुमार

सवाल है कि क्या क्वाड के साथ विश्व की नई व्यवस्था बन कर तैयार होगी, जो समुद्री नियमों और लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित कर पाएगी! यह नहीं भूलना चाहिए कि विश्व व्यवस्था में मजबूत देशों की कोशिश हमेशा एकपक्षीय होती है। यानी कोई भी नियम नहीं होता, बल्कि उनकी गतिविधियां ही नियम बनाती हैं।

पिछले दिनों मेलबर्न में क्वाड समूह के सदस्य देशों- अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान और भारत के विदेश मंत्रियों की बैठक में अफगानिस्तान, म्यांमा सहित कई गंभीर वैश्विक मुद्दों पर चर्चा हुई। बैठक के बाद जारी साझा बयान में पाकिस्तान और चीन के बीच ताजा मुलाकात को भी अप्रतयक्ष ढंग से रखने की कोशिश हुई। लेकिन यूक्रेन के मुद्दे पर भारत चुप रहा। कई अन्य वैश्विक मुद्दों पर आम सहमति बनी।

जैसे एक अनुशासित और व्यवस्थामूलक हिंद-प्रशांत क्षेत्र बनाने, कोरोना महामारी से लड़ने के लिए साझेदारी रणनीति और जलवायु संकट से निपटने के लिए योजना। लेकिन यह सवाल भी कहीं न कहीं हैरान तो कर ही रहा है कि आखिरकार यह तैयारी हो किसके खिलाफ रही है? क्या चीन विरोध की जरूरत सबके लिए एक समान है या आपस में भी मतभेद हैं? अगर हम क्वाड की धार और आधार को समझने की कोशिश कर रहे हैं, तो इसकी प्रासंगिकता पर चर्चा करना और जरूरी हो जाता है। हालांकि चीन इसे महज प्रचार तंत्र कह कर इसकी अहमियत कम करके दिखाने में लगा है।

क्वाड ने आतंकवाद पर भी कड़ा रुख दिखाया है। इस बैठक की भारत के लिए बड़ी उपलब्धि यह रही कि सभी सदस्य देशों ने मुंबई और पठानकोट जैसे आतंकी हमलों की कड़ी निंदा की। सीमा पार आतंकवाद पर पाकिस्तान को आड़े हाथों लिया। यह मसला इसलिए भी उठा क्योंकि कुछ दिनों पहले ही चीन दौरे पर गए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बातचीत में कश्मीर का मुद्दा उठाया था।

इसलिए इस बैठक के माध्यम से क्वाड ने आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को चेताते हुए कड़ा संदेश दे दिया। साझा बयान में साफ-साफ कहा गया कि 'हम सभी देशों से यह सुनिश्चित करने का आह्वान करते हैं कि उनके नियंत्रण वाले क्षेत्र का उपयोग आतंकवादी गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाए।' इस बैठक में अफगानिस्तान के मौजूदा हालात पर भी चिंता जताई गई।

चारों विदेश मंत्रियों ने सत्ता पर काबिज तालिबान को खरी-खरी सुनाई। साझा बयान में कहा गया कि 'हम यूएनएससी (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद) के प्रस्ताव 2593 (2021) की फिर से पुष्टि करते हैं कि अफगान क्षेत्र का इस्तेमाल किसी भी देश को धमकाने या हमला करने, आतंकवादियों को पनाह देने, उन्हें प्रशिक्षित करने, या आतंकवादी कृत्यों की योजना बनाने या वित्त पोषित करने के लिए नहीं होने दिया जाना चाहिए।'

मोटे तौर पर क्वाड चार देशों का संगठन है जिसमें भारत, अमेरिका, आस्ट्रेलिया और जापान शामिल हैं। ये चारों देश विश्व की बड़ी आर्थिक शक्तियां भी हैं। ये एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती दादागीरी और उसके प्रभाव को काबू में करना चाहते हैं। क्वाड को लेकर एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि 2007 में जापान के तबके प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने इसकी अवधारणा औपचारिक रूप से पेश की थी। हालांकि इसे 2004 में हिंद महासागर में आई सुनामी के वक्त प्रभावित देशों खासतौर से जापान की मदद के उद्देश्य से भी जोड़ा जाता रहा है।

वर्ष 2012 में आबे ने हिंद महासागर से प्रशांत महासागर तक समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आस्ट्रेलिया, भारत और अमेरिका को साथ लेकर 'डेमोक्रेटिक सिक्योरिटी डायमंड' बनाने का इरादा जताया था। कोविड संकट के मद्देनजर हाल में अमेरिका ने क्वाड प्लस की शुरुआत की और इसमें ब्राजील, इजराइल, न्यूजीलैंड, दक्षिण कोरिया और वियतनाम को शामिल किया गया। इसी तरह ब्रिटेन भी अब भारत सहित विश्व के दस लोकतांत्रिक देशों के साथ मिल कर एक गठबंधन बनाने पर विचार कर रहा है, जिसका उद्देश्य चीन पर निर्भरता को कम करते हुए इन देशों के योगदान से एक सुरक्षित 5जी नेटवर्क खड़ा करना है।

यह स्पष्ट है कि चीन की घेरेबंदी के लिए क्वाड तेजी से काम कर रहा है। हालांकि इसके लक्ष्य और भी हैं। हिंद प्रशांत क्षेत्र में क्षेत्रीय ताकतों के प्रभाव को भी नियम के दायरे में बांध कर रखना है। उसमें जापान, चीन दोनों ही हैं। दूसरे विश्व युद्ध के पहले जापान ने इसी रास्ते को अपनी जागीर बना लिया था। आज वही काम चीन करने की कवायद कर रहा है। अमेरिका इसलिए परेशान है क्योंकि इस क्षेत्र में उसकी सीधी पहुंच नहीं बन पा रही है। इसलिए वह भारत, आस्ट्रेलिया जैसे भागीदार देशों के बूते इस क्षेत्र में अपने कदम जमाने की दिशा में बढ़ रहा है।

दक्षिण चीन सागर में सबसे ज्यादा संकट जापान और अमेरिका का है। इस क्षेत्र के साथ ही पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में भी चीन ने पिछले दिनों अपनी गतिविधियां तेजी से बढ़ाई हैं। जापान का सेनकाकू द्वीप चीन के निशाने पर है। ताइवान को लेकर चीन जिस तरह बेताब है, उसके लिए भी उसे जापान को घेरना होगा। इस क्षेत्र में जापान और अमेरिका का सैनिक गठबंधन है। ताइवान को बचाने के लिए अमेरिका को भी जापान की मदद चाहिए। आस्ट्रेलिया भी अमेरिका का प्रमुख सहयोगी देश है और दोनों के बीच सैन्य सहयोग है। पर अभी भारत इस मुहिम में शामिल नहीं है। इसलिए यह प्रश्न अहम है कि चीन की घेरेबंदी को लेकर क्या चारों देशों की सोच एक जैसी है? पिछले दिनों आस्ट्रेलिया चीन के विरुद्ध सबसे ज्यादा मुखर था, विशेषकर कोरोना महामारी के दौरान।

भारत कभी भी क्वाड को सैन्य गठजोड़ बनाने के पक्ष में नहीं रहा और आज भी नहीं है, जबकि बाकी तीनों देश इसे नाटो की तरह सैन्य संगठन बनाने की दिशा में बढ़ते दिख रहे हैं। भारत के ना कहने के बाद ही तीन देशों का नया संगठन बना, जिसे ओकस नाम से जाना जाता है। जबकि सबसे बड़ी मुसीबत भारत के लिए चीन ही पैदा कर रहा है। हिंद महासागर में उसका जासूसी अभियान जारी है। दक्षिण एशिया के भीतर गुट बना कर वह भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम दे रहा है। श्री लंका का हंबनटोटा बंदरगाह, मालद्वीप, म्यांमा और बांग्लादेश भी चीन के निशाने पर हैं। फिर भी भारत हिंद प्रशांत को सैनिक मुठभेड़ का अड्डा नहीं बनने देना चाहता है।

दूसरा महत्त्वपूर्ण कारण भूगोल भी है। चारों देश धरती के अलग-अलग भूभाग पर स्थित हैं। इसलिए सबकी जरूरतें और रंजिश के कारण भी अलग-अलग हैं। ऐसे में लगता नहीं कि क्वाड एक मजबूत इकाई बन कर काम कर सकता है, विशेषकर चीन के प्रतिरोध में। जबकि चीन का व्यापारिक विस्तार चारों देशों के लिए एक मजबूरी भी है।

सवाल है कि क्या क्वाड के साथ विश्व की नई व्यवस्था बन कर तैयार होगी, जो समुद्री नियमों और लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित कर पाएगी? क्या विश्व की संस्थाए निष्पक्ष होकर काम करेंगी? यह नहीं भूलना चाहिए कि विश्व व्यवस्था में मजबूत देशों की कोशिश हमेशा एक पक्षीय होती है यानी कोई भी नियम नहीं होता, बल्कि उनकी गतिविधियां ही नियम बनाती हैं। उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटेन ने जो किया, वही पिछले सौ सालों में अमेरिका करता रहा है और अब चीन कर रहा है।

ऐसा नहीं कि चीन पर लगाम नहीं लगाई जा सकती। क्वाड चाहे तो भारत को मजबूत बना कर यह काम कर सकता है। इसके लिए अमेरिका और अन्य देश को बुनियादी सोच बदलनी होगी। तिब्बत चीन की सबसे कमजोर नब्ज है। इसके क्षेत्रफल का पैंतीस प्रतिशत हिस्सा तिब्बत का है। यहां इसकी सीमा भारत से मिलती है। इसलिए ध्रुवीकरण तिब्बत को लेकर होना चाहिए, न कि दक्षिण चीन सागर को लेकर। लेकिन इसमें दिक्कत अमेरिका और जापान को होगी और इसके लिए शायद वे कभी राजी भी न हो। भारत के लिए अपना हित ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। दुश्मन एक, लेकिन उसकी परछाई की लंबाई चारों के लिए अलग-अलग दिखाई देती है। यही सबसे बड़ी मुसीबत है।

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