नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल (एनजीटी) ने स्वच्छ गंगा मामले पर सुनवाई 17 फरवरी के लिए टाल दी है। पहले चरण के तहत गोमुख से लेकर कानपुर तक गंगा के बहाव क्षेत्र को स्वच्छ व प्रदूषण रहित बनाने के लिए एनजीटी सुनवाई कर रहा है।
बुधवार को गंगा में प्रदूषण को लेकर दो हलफनामे दाखिल हुए। पहला उत्तराखंड में आदेश का उल्लंघन कर गंगा और सहायक नदियों के प्रतिबंधित क्षेत्र में कैंप लगाने और दूसरा उत्तर प्रदेश के वाराणसी में अधजले शव फेंके जाने को लेकर है।
दोनों मामलों में ट्रिब्युनल ने संबंधित प्राधिकरणों से जवाब मांगा है। वहीं ट्रिब्युनल ने कानपुर में जाजमऊ स्थित चमड़ा उद्योगों को शिफ्ट किए जाने को लेकर भी प्राधिकरणों से स्पष्ट जवाब देने और अब औद्योगिक इकाइयों के जरिए प्रदूषण के खिलाफ उठाए गए कदमों का ब्योरा भी मांगा है।
जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने एमसी मेहता के मामले की सुनवाई की। इस दौरान ग्रीन बेंच ने दोनों राज्य सरकार और संबंधित प्राधिकरणों से इन मामलों पर अगली सुनवाई में जवाब देने को कहा है।
वहीं सरकार के दावे को झूठा बताते हुए सोशल एक्शन फॉर फॉरेस्ट एंड एनवॉयरमेंट (सेफ) एनजीओ ने हलफनामा दाखिल किया गया है। इसमें कहा गया कि पाबंदी के बावजूद ऋषिकेश में कई कैंप गंगा के किनारों पर लगे हुए हैं।
उत्तराखंड सरकार तथ्यों को छुपाकर ट्रिब्युनल को गुमराह कर रही है। एनजीओ ने दावा किया कि कनात और तंबू के जरिए अर्ध स्थायी कैंप बनाए जा रहे हैं। एनजीओ ने ग्रीन पैनल को बताया कि उत्तराखंड सरकार के हलफनामे के बाद एनजीओ द्वारा 19 जनवरी को दौरा किया गया था। इस दौरान पाया गया कि सरकार का दावा झूठा है।
बुधवार को गंगा में प्रदूषण को लेकर दो हलफनामे दाखिल हुए। पहला उत्तराखंड में आदेश का उल्लंघन कर गंगा और सहायक नदियों के प्रतिबंधित क्षेत्र में कैंप लगाने और दूसरा उत्तर प्रदेश के वाराणसी में अधजले शव फेंके जाने को लेकर है।
दोनों मामलों में ट्रिब्युनल ने संबंधित प्राधिकरणों से जवाब मांगा है। वहीं ट्रिब्युनल ने कानपुर में जाजमऊ स्थित चमड़ा उद्योगों को शिफ्ट किए जाने को लेकर भी प्राधिकरणों से स्पष्ट जवाब देने और अब औद्योगिक इकाइयों के जरिए प्रदूषण के खिलाफ उठाए गए कदमों का ब्योरा भी मांगा है।
जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने एमसी मेहता के मामले की सुनवाई की। इस दौरान ग्रीन बेंच ने दोनों राज्य सरकार और संबंधित प्राधिकरणों से इन मामलों पर अगली सुनवाई में जवाब देने को कहा है।
एनजीटी ने नदियों के किनारों से 100 मीटर दूरी तक पूर्ण रूप से प्रतिबंधित क्षेत्र बनाने का फैसला सुनाया था। इसके अलावा उत्तराखंड सरकार ने कहा था कि फैसले के बाद से अब तक कौड़ियाला से ऋषिकेश तक गंगा किनारे किसी तरह का कैंप नहीं लगाया गया।
वहीं सरकार के दावे को झूठा बताते हुए सोशल एक्शन फॉर फॉरेस्ट एंड एनवॉयरमेंट (सेफ) एनजीओ ने हलफनामा दाखिल किया गया है। इसमें कहा गया कि पाबंदी के बावजूद ऋषिकेश में कई कैंप गंगा के किनारों पर लगे हुए हैं।
उत्तराखंड सरकार तथ्यों को छुपाकर ट्रिब्युनल को गुमराह कर रही है। एनजीओ ने दावा किया कि कनात और तंबू के जरिए अर्ध स्थायी कैंप बनाए जा रहे हैं। एनजीओ ने ग्रीन पैनल को बताया कि उत्तराखंड सरकार के हलफनामे के बाद एनजीओ द्वारा 19 जनवरी को दौरा किया गया था। इस दौरान पाया गया कि सरकार का दावा झूठा है।
