रोजगार निगलती महामारी

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Jan 31st 2022, 16:05, by Bishwa Jha

सुधीर कुमार

पिछले दो साल में महामारी से उत्पन्न संकट ने रोजगार की समस्या को और गंभीर बना दिया है। इन दो सालों में करोड़ों लोगों को कामकाज से हाथ धोना पड़ा है। रोजगार जाने और नए अवसरों का सृजन नहीं होने से गरीबी की समस्या भी विकराल रूप धारण करती जा रही है। देश में बेरोजगारी की स्थिति कितनी भयावह हो गई है, इसका पता पिछले दिनों आई सेंटर फार मानिटरिंग इंडियन इकोनामी (सीएमआइई) की रिपोर्ट से चलता है। जाहिर है, महामारी से उत्पन्न रोजगार का संकट अभी टला नहीं है।

सीएमआइई की यह रिपोर्ट एक सितंबर 2021 से 31 दिसंबर, 2021 तक के रोजगार संबंधी आंकड़ों पर आधारित है जो श्रमबल, श्रमबल भागीदारी दर, नियोजित और बेरोजगार व्यक्तियों तथा बेरोजगारी दर की तस्वीर सामने रखती है। यह रिपोर्ट इस तथ्य को पुष्ट करती है कि बीते दिसंबर महीने में देश में बेरोजगारी दर 7.91 फीसद रही, जो पिछले चार महीने में सर्वाधिक और नवंबर, 21 की तुलना में एक फीसद अधिक है।

इससे पहले नवंबर में बेरोजगारी दर 6.97 फीसद, अक्तूबर में 7.74 और सितंबर में 6.86 फीसद रही थी। पिछले साल सर्वाधिक बेरोजगारी दर 11.84 फीसद के साथ मई महीने में रही, जबकि उस साल देश में औसत बेरोजगारी दर 7.80 फीसद रही थी। महामारी की वजह से न सिर्फ शहरी, बल्कि एक बड़ी ग्रामीण आबादी को भी बेरोजगारी का दंश झेलना पड़ा है। रिपोर्ट बताती है कि दिसंबर, 2021 में देश में शहरी और ग्रामीण बेरोजगारी दर क्रमश: 9.3 और 7.3 फीसद रही, जो नवंबर महीने की तुलना में क्रमश: 1.1 और 0.9 फीसद अधिक थी। रिपोर्ट से पता चलता है कि बेरोजगारों में करीब एक तिहाई महिलाएं भी शामिल हैं।

देश में बेरोजगारी दर लगातार बढ़ रही है। रोजगार सृजन एक गंभीर चुनौती के रूप में सामने है। कुछेक राज्यों को छोड़ दें तो बेरोजगारी के मोर्चे पर कमोबेश सभी राज्यों का हाल एक जैसा ही है। दिसंबर में चौंतीस फीसद बेरोजगारी दर के साथ हरियाणा देश का सबसे ज्यादा बेरोजगारी वाला राज्य रहा। वहीं राजस्थान (सत्ताइस फीसद), झारखंड (सत्रह फीसद), बिहार (सोलह फीसद) और जम्मू कश्मीर (पंद्रह फीसद) में भी बेरोजगारी दर उच्च ही बनी रही। दूसरी ओर 1.4 फीसद बेरोजगारी दर के साथ कर्नाटक, गुजरात और ओडिशा (1.6 फीसद), छत्तीसगढ़ (2.1 फीसद) और तेलंगाना (2.2 फीसद) अपनी आबादी को रोजगार मुहैया कराने के मामले में देश में सबसे अच्छी स्थिति वाले राज्य बन कर उभरे हैं।

पिछले दो साल में महामारी से उत्पन्न संकट ने रोजगार की समस्या को और गंभीर बना दिया है। इन दो सालों में करोड़ों लोगों को कामकाज से हाथ धोना पड़ा है। रोजगार जाने और रोजगार के नए अवसरों का सृजन नहीं होने से गरीबी की समस्या भी विकराल रूप धारण करती जा रही है। आजीविका और आय के खत्म होते स्रोतों ने समाज में तनाव, अवसाद और आत्महत्या जैसी प्रवृत्तियों को भी बढ़ावा दिया है। रोजगार का यह संकट स्थायी रूप से कब खत्म होगा, कह पाना मुश्किल है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) ने अनुमान लगाया है कि अगर दुनिया में महामारी नहीं आती तो करीब तीन करोड़ नई नौकरियां पैदा हो सकती थीं। संगठन की मानें तो हाल की वैश्विक बेरोजगारी ने कामकाजी निर्धनता उन्मूलन में पिछले पांच साल की प्रगति पर पानी फेर दिया है और कामकाजी निर्धनता 2015 के स्तर पर लौट आई है। मालूम हो, 2015 में ही वर्ष 2030 का 'टिकाऊ विकास एजेंडा' भी तय हुआ था।

निष्कर्ष यह है कि जहां से शुरुआत की गई थी, महामारी की वजह से हम फिर वहीं पहुंच गए! इतना ही नहीं, 2008-09 की महामंदी से उबरने की कवायदें चल रही थीं, महामारी से उन्हें भी गहरा धक्का लगा है। पंद्रह साल पहले की महामंदी की तुलना में महामारी के दौरान बेरोजगारी ज्यादा फैली है। साथ ही महिलाओं के रोजगार में गिरावट ने पिछले पंद्रह वर्षों की प्रगति को बाधित कर दिया है, जो महिलाओं के लिए बेहतर शैक्षिक अवसर, सेवा क्षेत्र में अधिक रोजगार और प्रवास में कमी पर आधारित थी।

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) द्वारा कराए गए एक सर्वे में चौंतीस फीसद फर्मों ने माना कि महामारी के कारण उनके व्यापार में गिरावट आई है। चवालीस फीसद फर्मों ने कहा कि पूर्णबंदी या आंशिक बंदी जैसे कदमों से उनका व्यापार कम हुआ, जबकि केवल दस फीसद फर्मों ने कहा कि महामारी ने उनके व्यवसाय को प्रभावित नहीं किया। जाहिर है, महामारी ने हर मोर्चे पर आर्थिकी को प्रभावित किया है।

आइएलओ की रिपोर्ट से इस बात की पुष्टि होती है कि महामारी के कारण वैश्विक स्तर पर रोजगार खोने के मामले में पुरुषों की तुलना में महिलाएं अधिक प्रभावित हुई हैं। रोजगार जाने जाने, वेतन कटौती, आय के स्रोत बंद हो जाने से करोड़ों महिलाओं को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा है। नतीजतन श्रम बाजार में महिलाएं बहुत पीछे चली गई हैं। ऐसे में कार्यक्षेत्र में महिलाओं की वापसी का संकट गहराता जा रहा है।

आइएलओ के मुताबिक 2019 की तुलना में 2021 में पुरुषों के रोजगार के स्तर में बहुत हद तक सुधार होता दिखाई दिया है, लेकिन पुरुषों की तुलना में तकरीबन एक करोड़ तीस लाख महिलाओं की रोजगार क्षेत्र में वापसी नहीं हो सकी। 2019-20 के दौरान पुरुषों के तीन फीसद नौकरी छीने जाने की तुलना में 4.2 फीसद महिलाओं के रोजगार छीने गए। वहीं कोरोना महामारी के दौर में पुरुषों और महिलाओं में रोजगार उपलब्धता को लेकर भी भारी असमानता देखने को मिली है।

पिछले साल दुनिया की कुल कार्यशील महिला आबादी के केवल तेतालीस फीसद हिस्से को ही रोजगार मिल पाया था, जबकि समान आयु वर्ग के उनहत्तर फीसद पुरुष रोजगार पाने में सफल रहे। श्रम बाजार में बढ़ती यह लैंगिक खाई चिंता पैदा करने वाली है। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र ने 2030 तक सभी क्षेत्रों में लैंगिक असमानता खत्म करने का संकल्प लिया है। लेकिन वर्तमान हालात को देखकर लगता नहीं कि यह संकल्प समय से पूरा हो पाएगा। हालांकि महामारी से पहले भी महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम रोजगार, कम पगार, काम के ज्यादा घंटे, करियर संवारने के सीमित अवसर जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। लेकिन महामारी ने कई मोर्चे पर महिलाओं की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

महिलाओं और पुरुषों के रोजगार छीने जाने और पुन: रोजगार प्राप्ति के मामले में असमानता पूरी दुनिया में देखने को मिली है। 2019-20 में अमेरिका में महिलाओं के रोजगार में 9.4 फीसद की कमी आई, जो पुरुषों की तुलना में 2.4 फीसद अधिक रही। इसी अवधि में अरब देशों में महिलाओं के रोजगार में 4.1 फीसद, जबकि पुरुषों के रोजगार में 1.8 फीसद की कमी दर्ज की गई।

एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों में हर सौ महिलाओं में से चार महिलाओं से रोजगार छीना गया, जबकि इतने ही पुरुषों में दो पुरुषों के रोजगार गए। यूरोप और मध्य एशिया में भी ऐसे ही हालात रहे, जहां पुरुषों की तुलना में महिलाओं से रोजगार जाने की दर अधिक रही। हालांकि महामारी काल में महिलाओं की पीड़ा केवल रोजगार से वंचित रहने भर तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि इस दौरान घरेलू हिंसा और काम से संबंधित लिंग आधारित हिंसा और उत्पीड़न की घटनाएं भी बढ़ी हैं।

बहरहाल बेरोजगारी से निपटने की दिशा में ठोस और स्पष्ट रोजगार नीति की दरकार है, ताकि लिंग के आधार पर रोजगार के अवसरों में कमी और समान काम के लिए दिए जा रहे वेतन में लैंगिक आधार पर कटौती जैसी समस्याओं का समाधान कर सके। बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए सरकारों को जहां ठोस नीति के जरिए बेकारी उन्मूलन और अवसरों के सृजन के प्रति संजीदा होना चाहिए, वहीं स्वरोजगार को बढ़ावा देने वाली नीतियों पर भी तेजी से काम होना चाहिए।

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